Tuesday, August 23, 2011

|| राष्ट्रशक्ती सुक्त ||

जहां आज, इस जहां मे
फैला है अंधेरा जीवनपर |

नीती, स्वाभिमान, मानवता,
चढा दी गयी है सुलीपर |

वासना के दुर्गंध से भरे,
हमारे बाग, बगीचे, नरहर,
भोग ही बन गया है जीवन, प्रेम की अर्थियां उठ रही है,
अर्थ के अर्थहीन, अवमूल्नपर |

मुद्रा के छनछनाते घुंगरु पहनकर,
भ्रष्टाचारी कर रहे है अविरत तांडव |

ऐसा क्यों है? कैसे है? कबसे है?
सोचने का समय भी कहां है?

जीवन के हो रहे इस हास का,
कर्म क्या है? फल क्या है? अन्त क्या है ?

अचेतना के इस अंधकार मे,
अण्णा चेतना जगाने आए है |

अपने ही कर्मो का फल भुगतने वालो को,
राष्ट्रशक्ती की याद दिलाने आए है |

मै हुँ अण्णा, वह है अण्णा,
हम सब मे है अण्णा |

राष्ट्रद्रोही, भ्रष्टाचारी, अब यह सत्य अपनाले,
हम सब है, प्रज्ववलित हुई, 'राष्ट्रशक्ती' की मशाले |



15 comments:

  1. How many have read this?

    ReplyDelete

Come & share your views on social issues of your concern